Saturday, April 5, 2025
ज़िंदगी उदास क्यूं हो!
Tuesday, March 4, 2025
ख्वाहिशें
ख्वाहिशें
रुह ने जब पहना जिस्म का जामा
साथ आईं ख्वाहिशें खरामा खरामा
ख्वाहिशें कहां कभी होती हैं पूरी
जिंदगी भर तड़पा कर भी रहतीं हैं अधूरी
हम आधे अधूरे ख्वाब लिए फिरते हैं
दिल में चाहतों की सौगात लिए फिरते हैं
यूं ही ज़िंदगी में सौगात कहां मिलते हैं
बगैर मेहनत बागों में फूल कहां खिलते हैं
बेलगाम बेहिसाब ख्वाहिशें गम का हैं सबब
इन्हें वस में रखने की हिम्मत दे हमें यारब
राजीव 'रंजन'
नोएडा
04 मार्च 2025
Sunday, March 2, 2025
नदी
नदी
राजीव 'रंजन'
चल पहाड़ों से दूर
निकल, नदी आई है
कल कल छल छल बहती
रस्ते के कष्टो को सहती
प्रकृति को समृद्ध बनाती
समतल रस्तों पर
वेग से उतर आई है
खेतों को कर हरा भरा
पशु पक्षियों की प्यास बुझा
बहती टेढ़े मेढ़े रस्तों पर
शहरों गांवों से होती,
मदमस्त बढ़ती आई है
समुद्र तक का है यह सफर
चिर मिलन की आस लिए
मन में यह विश्वास लिए
सदियों से चलती आई है
जीवन भी है नदी समान
अविरल चलता आया है
जन्म मृत्यु के बंधन काट
महामोक्ष को होने प्राप्त
उत्कट अभिलाषा लिए निस्सीम
अनंत से अनंत तक चलने आया है
Wednesday, November 13, 2024
अंतरात्मा और अहंकार
अंतरात्मा और अहंकार
राजीव 'रंजन'
07/04/2023
आत्मा और शरीर से उत्पन्न मानव की विविध गतियां
एक में शुद्ध, शाश्वत, सत्य, सद्गुणों से उत्पन्न वृत्तियां
दूसरे में शरीर, संसार, समय के अनुरुप मानव कृत्तियां
अंतरात्मा की दबी पुकार
अहंकार का बढ़ता हुंकार
अंदर से उपजी आवाज सिर्फ स्वयं को ही सुनाई देती
हमेशा सही ग़लत, अच्छा बुरा के मापदंड पर तौलती
सुने न सुने, पर अहसास दिलाती, मन को नित्य कचोटती
अंतरात्मा कभी न शांत
अहंकार हमेशा मधांन्ध
आत्मा, प्रकृति प्रदत्त वह चेतना, जो ब्रह्मांड से है जुड़ी
भौतिक शरीर, उस चेतना का स्थूल रुप और मुख्य कड़ी
अंतरात्मा की दबी आवाज, मार्ग दर्शक सी सदैव खड़ी
अंतरात्मा सही ग़लत का मापदण्ड
अहंकार शक्ति और प्रतिष्ठा का घमंण्ड
अहंकार जग, काल, व्यक्तित्व की पहचान बन उफनती
नैतिक अनैतिक को रौंद, स्वार्थ सिद्धि हेतु अक्सर पनपती
अहंकार आग्नेय बन सर्वस्व स्वाहा करने की क्षमता रखती
अंतरात्मा जैसे राम की
अहंकार जैसे रावण का
'अंतरात्मा क्या है?' यह सारगर्भित प्रश्न हमे करता विचलित
'अहंकार क्यूं है?' यह सब के व्यक्तित्व में रहता सम्मिलित
दोनों मनुष्य के विकास और मान्यताओं से रहते उद्धृत
अंतरात्मा का प्रवाह अविरल
अहंकार जैसे क्षणिक हलचल
Saturday, November 9, 2024
आस - हिन्दी कविता राजीव 'रंजन'
मेरे जूते - हिन्दी कविता राजीव 'रंजन'
हमारे बाबा - बाबू रघुनाथ सिंह जी
हमारे बाबा - बाबू रघुनाथ सिंह जी
राजीव 'रंजन'
सुबह आजी तुलसी को पानी देतीं
बाबा नीम के दातुन तोड़ते
चाचा दालान खरहरते
चाची चुल्हा लीपतीं, नाश्ते की तैयारी करतीं
बाबा खेत की ओर निकल पड़ते
हाथ में लोटा और दातुन ले सारे खेत धूम आते
लौटते पोखरा पर दातुन कर कुल्ला करते
साथ ही नहां लेते
बाबा के आते ही सभी घाट छोड़ देते
बड़ों का आदर जो ठहरा
उनके जाते ही फिर बच्चों की धमा-चौकड़ी
गीले ही गावटी गमछा लपेट शिवाला पर जल चढ़ाते
रास्ते में सभी रास्ता छोड़ आदर से कगार हो जाते
आजी को मालूम था लौट खराई तोड़ेंगे
गुड़ की भेली, पानी और कपड़े ले दरवाजे पर मिलतीं
चाचा चिलम चढ़ा लाते, आजी नास्ता लातीं
शिवमंगल दूबेजी, बाबा के परम मित्र, आ जाते
फिर तो ठहाकों के बीच दुनिया की सारी खबर होती
सरकार की शिकायत से नहर में पानी का आना होता
धीरे धीरे और लोग जुड़ते जाते, मजमा लग जाता
दोपहर तक हर खबर, हर चर्चा आम होती, जीवन होता
खाना खा बाबा आराम से सोते, उठाया तो वज्रपात
शाम फिर गुलजार, गवनई अक्सर होती या रामायण चर्चा
गोरख, मक्खन, जलील, अर्जुन सब दरी पर बैठे होते
बाबा को ढोलक और खंजड़ी बजाने का शौख था
कजरी, बिरहा, पुरबिया, बिदेशिया, चैता का समां होता
गांव में जब कोई नहीं पढ़ा था तो उन्हो ने बेटे को पढ़ाया
मान्यता थी कि, 'जो हाई स्कूल करता है अंधा हो जाता है'
बड़ी मुश्किलों से, सबके विरोधों के विपरीत कॉलेज भेजा
बाबूजी जब प्रशासनिक सेवा में आए तो बाबा जिद्द कर बैठे
"द्वार पर अब हमें हाथी बांधनी है", बाबूजी परेशान
इतना पैसा कहां से आएगा, नई नई नौकरी है
खाना पीना छोड़ घर से निकल पड़े, मनाने वाले पीछे पीछे
बनारस के घाट पर गांव के परिचित ने पहचाना
हार कर सोनपुर मेला से कर्जा गुलाम ले हाथी आयी
दस गांव उमड़ पड़ा हाथी दरवाजे पर देखने
गांव से गुजरती हुई एक दिन हाथी ने गन्ना तोड़ लिया
बाबू साहब नाराज और लाठी से हाथी को दे मारा
हाथी डरकर भाग निकली, बाबा की इज्जत मिट्टी में
परम मित्र बोले "मलिकार नर होता तो ऐसा न होता"
बाबा पुनः जिद्द में, अगले वर्ष सोनपुर मेला गए बदल लाए
फिर क्या मजाल कि कोई उसके पास भी फटक ले
बाबा बिरले ही हाथी पर चढ़ते, पर शान सातवें आसमान
हम लोग जब गांव जाते बलिया स्टेशन पर हाथी रहती
उनका हुक्म था उसी पर चढ़ कर गांव आना है
सामान पीछे पीछे रिक्शे पर कोई कारिंदा लाता
बाबा द्वार छोड़ कहीं न जाते, अकेले भी खंजड़ी बजाते
धोडे़ और हाथी के देशी इलाज में माहिर
दूर दूर से लोग आते इलाज और सलाह के लिए
दालान पर बहुत बड़ी चौकी बिस्तर समेत बिछी रहती
साधूओं और रिश्तेदारों का हमेशा मजमा लग रहता
आजी भुनभुनाती, "सब ऐसे ही लुटा देंगे ये"
"बाबू रघुनाथ सिंह का आक्समिक देहांत हो गया"
औरंगाबाद, बिहार से हम जैसे तैसे गांव पहुंचे
वो दालान, वो करीने से बिछी बिस्तर सूना पड़ा था
इसे गुलजार करने वाला अब न रहा
हाथी भी थोड़े दिनों बाद बेच दी गई, उनके मित्र भी न रहे
वो चोकी, वो चिलम, वो दालान, वो हथिखाना वहीं हैं
पर वो रौनक कहां उस दालान की जो बाबा ने सजाई थी
निर्जीव नहीं, इन्सान जान फूंकते है चीजों में
और रह जाती हैं उनकी अमिट यादें, उनके फसानों में