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Sunday, July 27, 2025

अदरक कूटने की आवाज

अदरक कूटने की आवाज

राजीव 'रंजन' 

उनींदा सी मेरे कानों को अदरक कूटने की आवाज मंदिर के घंटी सी लगती है

हवाओं को चीरती एक मीठी सी प्यास, सुबह की चाय को तलब करती है

मैं चुपचाप लेटी आधी सोई आधी जागी, दबे कदमों का करती इंतजार हूं

बगल में कप रखने की हल्की आवाज के लिए दिल थाम रहती बेकरार हूं

एक हल्की सी आवाज़ "मनीषा चाय", कानों को लगती कितनी प्यारी 

मैं करवट बदल, पहली घूंट की, मन ही मन, करती हूं आलस भरी तैयारी 

सुबह के गर्म चाय से मुझे मिलता है वो सुकून जो मेरी समझ से बाहर है

अद्भुत वो पहली घूंट पूरे दिन के लिए जो भरती भरपूर शक्ति मेरे अंदर है

कुहनी पर उचक, अधखुली आंख से, सिकुड़े होंठों से, लगाती सुडुक प्यारी 

अमृत रस जैसे उतरता गले से, तरोताजगी भरता अंदर तक धीरे-धीरे हमारी

औंधी लेट, घूंट दर घूंट, चाय के साथ विचारों में गुम, मैं सोती उठती रहती हूं

दिन भर के उहापोह के बवंडर में 

बेझिझक मैं इस परम आनंद के लिए कुछ भी कर सकती हूं न्योछावर 

तहे दिल से शुक्रिया उस व्यक्ति का जो देता है यह परम सुख, है वो मेरा वर

 (पत्नी के आग्रह पर लिखी है यह कविता। उनकी भावनाएं, मेरे शब्द)

नोएडा

20 मार्च 2025

Sunday, June 15, 2025

एक नारी की अनूठी कहानी

एक नारी की अनूठी कहानी 

राजीव 'रंजन' 

एक कहानी अनूठी सी आज सुनाता हूं

नारी के जीवन की विडंबना बताता हूं

धूम धाम से बारात आई गांव में उसकी

१४ वर्ष की थी, शादी हो रही थी जिसकी

गाजा बाजा, नाच नचनियों का था बंदोबस्त 

खाना पीना इतना अच्छा कि सब थे मस्त

समय आया बिदाई का, मिलनी पर थे सब बैठे

लड़के वाले तो पहले से ही रहते हैं कुछ ऐंठे

बे सिर पैर के मजाक पर, अहंकार टकराया

न जाने कब इज्जत का मामला गहराया

बिदाई के धोती की टोकरी को मार लात

उठ चली बारात, बिना खाए मिलनी की भात 

दुल्हन की डोली पहले ही विदा हो चुकी थी

गांव से बाहर सनिचरा बाबा के पास रुकी थी

रोती कलपती, गई वो बच्ची अपनो को छोड़

२५ वर्षों तक, न लौट पाई मैके, भाग्य को मोड़

मां बाप, नातेदार, रिस्तेदार सब स्वर्ग सिधारे

बेटी मिल न पाई कभी उनसे, लौट अपने द्वारे

खोखले अहंकारों की बली चढ़ गयी थी नारी

उसके आंसूओं की कीमत समाज ने नकारी

भूल अपने अस्तित्व को बनी मां, चाची, दादी

नए घर और समाज को अपना, वो सीधी सादी

दिन बीता, वर्ष बीते, बीता एक युग, पलटा भाग्य

दो भाईयों की थी अकेली बहन, जागा अनुराग 

भाई थे पढ़ें लिखे, छोड़ दकियानूसी ख्याल

आए बहन के द्वार स्नेह की अपनी बाहें पसार

बहन घंटो रोती रही, छोटे भाइयों से गले मिल

ईश्वर ने जैसे लौटाई थी यादें, खुशियां और दिल

कहां बैठाऊं, क्या खिलाऊं चल रहा था उहापोह

गांव घर के लोग न अघाते थे देख बहन भाई का मोह

साग्रह किया बहन को विदा कर ले जाने की इच्छा

सहर्ष हुई सब तैयारी, और खत्म हुई वर्षों की प्रतीक्षा

अद्वितीय हुआ मैकै में बहन का स्वागत सत्कार 

छ: माह बाद पतिदेव आए विदा कराने ससुरार

भाई ने प्रेम से पूछा कि 'दीदी क्या दें तुम्हें विदाई'

मां ने सरस हृदय से मांगा अपने पुत्र की पढ़ाई 

"भाई आप तो सक्षम बैरिस्टर हैं, मेरे पुत्र को पढ़ा दें"

"अपने पुत्र के साथ इस पर भी ज्ञान की वर्षा करा दें"

भाई ने वचन दिया और मेरे पिता इस तरह पढ़ पाए

अपने मामा के संरक्षण में उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाऐ

उसके कारण हम तीन भाईयों को भी हुई प्राप्त शिक्षा  

और हमारे बच्चों ने भी पढ़ लिख कर पाई दीक्षा

परिवार ने जाना पढ़ाई लिखाई का जीवन में महत्व

पर इस सब के पीछे था एक नारी का व्यक्तित्व 

जीवन भर के उसके त्याग और स्नेह की कहानी

और आंसूओं से लिखे सपने और उसकी परेशानी

Saturday, May 24, 2025

सही राह

सही राह 

भारतवर्ष का संविधान ही मिटा सकता है सारे व्यवधान

सदियों बंटे रहे, विदेशियों ने पहनाया परतंत्रता का परिधान

धीरे-धीरे व्यवस्थाएं और समाज बदले, निकल रहा समाधान

सदियों की समस्याएं सुलझती नहीं, कर महज व्याख्यान


हर कोई संविधान छोड़ बना रहा न जाने कौन सा हिंदुस्तान 

लक्ष्य पर निगाह कदम धीरे-धीरे लिए मंजिल का अरमान


समस्याओं को नियम कानून से सुलझाए हमारा संविधान 

जहर भर गया जब सांसों में, कहां फिर एकता का अनुष्ठान


पृथक-पृथक आवाजों ने हिंसा का लिया सहारा देश लहुलुहान 

दुश्मन खड़ा सीमा पर करता आतंकी हमलों का इमकान


युद्ध भेरियां बज चुकीं आतंकियों को पहुंचाना होगा श्मशान 

भारत के लाल उठो, रण की अब तैयारी में दो अपना योगदान

Saturday, April 5, 2025

ज़िंदगी उदास क्यूं हो!


ज़िंदगी उदास क्यूं हो!

जिंदगी उदास क्यूं हो
दिन बेआस क्यूं हो
मंजिलें और भी हैं
चाहतें और भी हैं
मन पर बस न उसका
तन है  स्वस्थ जिसका
सफ़र सिद्दत से जारी है
अनजान रस्तों की तैयारी है
अब समय है अपने लिए 
आंखों में बाकी सामने लिए
छोड़ो!! जिसे जाना था गया
जिसे आना था आया
जीवन का यह खेल है
अक्सर मिलता बेमेल है
पत्ते वो देता है
खेल हम खेलते हैं
कहां बस में है अपने
बस एक सफर है 
और चलते जाना है
कौतुहल लिए 

राजीव 'रंजन' 
05/04/25
नोएडा

Tuesday, March 4, 2025

ख्वाहिशें

ख्वाहिशें 


रुह   ने   जब  पहना   जिस्म  का   जामा

साथ   आईं   ख्वाहिशें    खरामा   खरामा


ख्वाहिशें   कहां    कभी    होती   हैं    पूरी

जिंदगी  भर तड़पा कर भी रहतीं  हैं अधूरी


हम  आधे  अधूरे   ख्वाब   लिए  फिरते  हैं 

दिल में चाहतों  की सौगात  लिए  फिरते हैं 


यूं  ही  ज़िंदगी  में  सौगात  कहां  मिलते  हैं

बगैर मेहनत  बागों में फूल  कहां  खिलते हैं 


बेलगाम बेहिसाब ख्वाहिशें गम का हैं सबब 

इन्हें  वस में रखने की  हिम्मत  दे हमें यारब


राजीव 'रंजन'

नोएडा

04 मार्च 2025

Sunday, March 2, 2025

नदी

नदी

राजीव 'रंजन'

चल पहाड़ों से दूर

निकल, नदी आई है

कल कल छल छल बहती

रस्ते के कष्टो को सहती

प्रकृति को समृद्ध बनाती

समतल रस्तों पर

वेग से उतर आई है

खेतों को कर हरा भरा

पशु पक्षियों की प्यास बुझा

बहती टेढ़े मेढ़े रस्तों पर

शहरों गांवों से होती,

मदमस्त बढ़ती आई है

समुद्र तक का है यह सफर

चिर मिलन की आस लिए

मन में यह विश्वास लिए

सदियों से चलती आई है

जीवन भी है नदी समान

अविरल चलता आया है

जन्म मृत्यु के बंधन काट

महामोक्ष को होने प्राप्त

उत्कट अभिलाषा लिए निस्सीम

अनंत से अनंत तक चलने आया है

Wednesday, November 13, 2024

अंतरात्मा और अहंकार


अंतरात्मा और अहंकार


राजीव 'रंजन'

07/04/2023


आत्मा और शरीर से उत्पन्न  मानव की  विविध  गतियां

एक में  शुद्ध, शाश्वत, सत्य, सद्गुणों  से उत्पन्न वृत्तियां 

दूसरे में  शरीर, संसार, समय के अनुरुप मानव कृत्तियां


अंतरात्मा की  दबी पुकार

अहंकार का बढ़ता हुंकार 


अंदर से उपजी आवाज  सिर्फ स्वयं  को  ही  सुनाई  देती

हमेशा सही ग़लत, अच्छा  बुरा  के  मापदंड   पर  तौलती

सुने न सुने, पर अहसास दिलाती, मन को नित्य कचोटती


अंतरात्मा कभी न शांत

अहंकार हमेशा मधांन्ध


आत्मा, प्रकृति प्रदत्त वह  चेतना, जो  ब्रह्मांड से  है जुड़ी 

भौतिक शरीर, उस चेतना का स्थूल रुप और मुख्य कड़ी 

अंतरात्मा की दबी आवाज, मार्ग  दर्शक सी  सदैव खड़ी


अंतरात्मा सही  ग़लत  का  मापदण्ड

अहंकार शक्ति और प्रतिष्ठा का घमंण्ड


अहंकार जग, काल, व्यक्तित्व  की  पहचान  बन  उफनती

नैतिक अनैतिक को रौंद, स्वार्थ सिद्धि हेतु अक्सर पनपती

अहंकार आग्नेय बन सर्वस्व स्वाहा करने की क्षमता रखती


अंतरात्मा जैसे  राम की

अहंकार जैसे रावण का


'अंतरात्मा क्या है?' यह  सारगर्भित  प्रश्न  हमे  करता विचलित 

'अहंकार क्यूं है?' यह  सब के व्यक्तित्व  में रहता सम्मिलित

दोनों  मनुष्य  के विकास  और मान्यताओं  से रहते  उद्धृत 


अंतरात्मा का  प्रवाह अविरल

अहंकार जैसे क्षणिक हलचल






Tuesday, April 9, 2024

दोस्त

दोस्त
(राजीव 'रंजन')

दिल  के  सारे रिश्ते  ये, कहां समझ  में आते  हैं।
मन से मन की बातें हैं, दिल से  दिल को भाते हैं।। 

कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो दिल के करीब रहते हैं।
वर्षों के कुछ रिश्ते‌ हैं, जो बड़े नसीब  से बनते  हैं।।

खुलकर  इनमें  हंसते  हैं,  बातें  मन की  करते हैं।
अच्छे  हों या  बुरे  मगर,  कहां  विचारा  करते  हैं।।

बातों  में  कुछ  अल्हड़पन, मस्ती  और शरारत  है।
जीवन भर का साथ इनका,दोस्ती बड़ी नियामत है।।

जिंदादिली इन रिश्तों में, गर्मजोशी इन फरिश्तो में।
दोस्त  ही  इस  जीवन  में,  ले  जाते हैं बहिश्तों  में।। 

अर्थ 
(नियामत - ईश्वर का दिया हुआ वैभव, धन सम्पत्ति
बहिश्तों - जन्नतों, स्वर्ग, heaven)

Tuesday, December 26, 2023

ईश्वर

ईश्वर 

जो है विश्व  का रचयिता, पालनहार, उससे डर क्यूं

जो है सर्वज्ञ, स्थितप्रज्ञ, सर्वशक्तिमान उससे भय क्यूं

जो है व्याप्त सर्वत्र, है अनंत, फिर खोज अन्यत्र क्यूं

जो है शक्ति स्वरुप विद्यमान सबमें फिर हम लाचार क्यूं

कब  वो  किसी  से  कुछ  कहता  और मांगता है

कहां  किसी  से  त्याग  और  बलिदान चाहता है

हरेक  की  मांग  पर, तथास्तू  सदैव  कहता है

अन्त:  आवाज  बन, कर्म  की  गठरी  खोलता है

प्रत्यक्ष तो  आता  नहीं, हरेक  में  सदैव बसता है

माध्यम  बन, विभिन्न  गुणों  से  सबको रचता है

कर  प्रयोग  उनका, देवत्व को प्राप्त  हो सकते है

क्यों  भटकना  इधर  उधर जब वो व्याप्त हममें है

ईश्वर द्योतक है प्रेम का, साहस का, भक्ति का, बल का

कहां स्थान इन सब में है भय का, चिन्ता का, डर का

पवित्र  यह अनुभूति, जो, आत्मा  को  कर प्रकाशित

मार्ग  को  प्रशस्त  करती, चेतना को करती प्रज्वलित

राजीव सिंह

नोएडा