Thursday, November 7, 2024
Life
Tuesday, August 20, 2024
उद्वेलित मन
अविरल
अविरल
राजीव 'रंजन'
अविरल जीवन की धारा
अनजान हैं इसकी राहें
अनवरत है चलते जाना
अनंत की फैली बाहें
अज्ञानता खड़ी मुंह बाए
पथ अंधकार बनाने को
है बुद्धि विवेक सहारा
ज्योति सर्वत्र फैलाने को
यह काल चक्र अविरल है
अनंत से अनंत तक फैला
ब्रह्मांड इसी में सिमटा
रहता है राज लिए गहरा
अविरल श्रृष्टि के हम सब
हैं क्षणिक काल की कृतियां
है नश्वर, सब है माया
उस कलाकार की वृत्तियां
क्षणभंगुर है यह जीवन
आशाओं में हर पल लिपटा
महत्वाकांक्षाएं लिए अनंत
है अपने आप में सिमटा
सागर की अविरल लहरें
ललचातीं क्षणिक मिलन को
कूलों को छू भर आतीं
जातीं वो लौट मगन हो
लालिमा क्षितिज पर छाई
थक अस्त हुआ दिवाकर
फिर प्रातः पुनः निकलना
आशा भर जाता प्रभाकर
जीवन की इस बगिया में
उस व्यक्ति का मिल जाना
जो स्नेह करे न्योछावर
वसंत का ज्यों है आना
है मिलना और बिछड़ना
सिक्के के दो बस चेहरे
दिन और रात हैं जैसे
समय के राज वो गहरे
पाकर वो स्नेह तुम्हारा
भीगा अंत: मन मेरा
अघा गया हूं तब से
मैं चिर कृतध्य हूं तेरा
शिव शंकर
शिव शंकर
(राजीव 'रंजन')
हे नीलेश्वर अलख निरंजन प्रतिपालक शिव शंकर हे
नीलकंठ नीलाद्री निलोत्पल, नागार्जुन नागेश्वर हे
त्रिलोकनाथ त्रिगुणा त्रिदेव त्रिपुरारी त्रिनेत्र त्रिकालेश्वर हे
अनादि अनुपम अगम्य अव्यय अखिलेश ओम ओंकारेश्वर हे
तुम अनंत जग पालनकर्ता विश्वनाथ सर्वेश्वर हो
मां गौरी के उमापति, कार्तिक गणेश के पिता जो हो
"शि" से तुम अभयदानी करुणाकर और पाप विनाशक हो
"व" में है वह शक्ति निहित, भक्तों के कष्ट निवारक हो
ब्रह्मा की उत्पत्ति तुमसे , सृष्टि के हो तुम सृजन हार
विष्णु तुम हो, पालनकर्ता, विश्व के हो तुम परम आधार
समुद्र मंथन से उदित हुआ मानव के पापों का गरल
कंठागत, विनाशक विष किया, हे नीलकंठ, सहज ही सरल
त्रिनेत्र खुला, तोड़ा जो ध्यान तुम्हारा, कामदेव भश्म हुए
महाकाल विकराल का तांडव नृत्य फिर नटराज ने किए
ध्वस्त हो रही थी सृष्टि, जब देवी मां ने तुम्हें शान्त किया
मां शक्ति के आग्रह पर, कैलाश से आ काशी में वास किया
हे शिव शंकर, शिव लिंग है द्योतक सृष्टि के सृजन शक्ति का
ध्यानमग्न रहते तुम निरंत र समपुर्ण भक्ति से उस शक्ति का
नमन हमारा, हे यजामह, कल्याण मार्ग पर मैं चल पाऊं
पा प्रसाद तुम्हारा हे प्रभु! अखंड ज्योति में समा जाउं
Thursday, August 8, 2024
दुआ
Thursday, August 1, 2024
अभिलाषा
हमारे राम
हमारे राम
(राजीव 'रंजन')
मन के मेरे अंतस्तल में, हे राम! हमारे बसते हो
मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा में, बांध हमे जो रखते हो
होश संभाला जब से है, हर समय तुम्हारा नाम सुना
रामायण की कथाओं ने भावनाओं का सुंदर जाल बुना
हे मर्यादा पुरुषोत्तम! तुम हो हम सबके आदर्श पुरुष
भावना विवेक के सम्मिश्रण का मूर्तरुप आकार सदृश
धर्म परायण शांन्त रुप, दृढ़प्रतिज्ञ समग्र ज्ञानी स्वरुप
करुणा के सागर दयानिधान, भक्त वत्सल समदर्शी भूप
भारत के नैतिक मूल्यों का हो तुम केन्द्र सुदृढ़ और अचल
जीवन तुम्हारा, स्वयं रहा चुनौतीयों से भरा अविरल
राज्याभिषेक की थाल सजी, पाया वनवासी का वस्त्र धवल
इच्छा मां की आदेश पिता का, धरे मन में निकले राह नवल
जंगल था दुर्गम, कोमल सुकुमारी सीता और लक्ष्मण साथ
विषम परिस्थितियों में भी भार्या और भाई ने छोड़ा न हाथ
स्नेह की हो मूर्ति, अश्रुपूरित नेत्रों से हुआ राम भरत मिलाप
केवट ने पांव धो, सबरी ने झूठे बेर खिला मिटाया संताप
प्रासादों में रहने वाले जंगल का सहर्ष सुख दुख झेल रहे थे
विपदा आयी, रावण ने छला, भाई जब आखेट खेल रहे थे
मां सीता का हरण हुआ, विह्वल खोजते फिरते डगर डगर
घायल वृद्ध जटायू ने बताया, रावण ले गया उन्हें किस नगर
मित्रों के हो तुम मित्र प्रभू! सुग्रीव का तुमने उद्धार किया
ज्ञानी अज्ञानी बाली के अहंकार को कर चूर, संहार किया
आंखें खुलीं बाली की जब, पा क्षमा स्वर्ग सिधार गया
श्रापित पाषाण बनी अहल्या को भी छू तुमने तार दिया
सुग्रीव सेना प्रमुख, हनुमान सलाहकार, थे अंगद दूत सबल
जामवंत, क्राथ, द्विविद, केसरी, मैन्ध, पनस यूथपति प्रबल
संपाति की दृष्टि, नल का ज्ञान, नील का कौशल पुल महान
औषधि कुशल वैद्य सुषेण, विभीषण मित्र तो कौन व्यवधान
लंका विजित हुई, रावण असम्मानित न हुआ, न लंका ध्वस्त
गुरु स्वरुप प्रतिस्थापित हुआ, लक्ष्मण ने पाई शिक्षा समस्त
सीता की अग्नि परीक्षा राम की थी राजनैतिक विवशता
लौट अयोध्या, सीता का वन जाना, थी राम की परवसता
राम हमारी सभ्यता के है कर्णधार, सुत्रधार और पूर्ण आधार
रोम रोम में बसते हैं, जनमानस के हैं आचार और विचार
बाह्य परिस्थितियां के विपरीत, मन से राम रहते समभावी
स्थितप्रज्ञ, क्रोध रहित, इन्द्रजीत, समदर्षी और जगव्यापी