Friday, August 8, 2025

हे सखे !! एक आग्रह!!!

हे सखे!! एक आग्रह!!!

हे सखे! मेरे प्रणय प्रतीक!!

मेरे जीवन के प्रज्वलित दीप

तुम चलो , जब मैं रुकूँ

हो सबल,

मेरे संगीत के सुरों को

बिखरे पड़े हैं जो

नए सुरों में पिरो दो

नई रागिनी

नए धुन बना दो

तुम तो स्वयं हो वीणा की तान

अपने कला की प्रखर पहचान

मेरा हृदय आस्वस्त हो

कि जब मैं दूर नए लक्ष्य

की खोज में निकलूं

तो तुम हो निर्भीक खड़ी

स्वयंसिद्धा समान

जीवन के नवल पथ पर

नवल रस भर

नवल लक्ष्य धर

अग्रसर......

सहृदय.. सक्षम... प्रबल.... अविरल.....

राजीव 'रंजन'

नोएडा

ज़िन्दगी का क़िस्सा The Story of Life

ज़िंदगी का किस्सा

राजीव "रंजन"

मौत के नाम का तो सिर्फ बहाना था

दरअसल ज़िंदगी का ही किस्सा सुनाना था

मुख्तसर सी है ये और हसीन इतनी

कि हर पल जन्नत के सुकून सा फसाना था

बस काबिज में हों ख्याल अपने

वर्ना यही तो ज़िंदगी तबाह करने का तराना था

कुदरत और इन्सानियत पर जो खरा उतरे

ऐसी समय तरीन सोच से खुद को सजाना था

मौसम की तरह बदलते हैं जो जज्बात

गरज़ते हैं बरसते है, फिर उन्हें बदल जाना था

बदलते नहीं आबो हवा जगहों के यूं ही

मजबूत ख्यालों को नहीं हर बार डगमगाना था

उखड़ गए जो पांव तेज हवाओं में

तूफानों से होगा कैसे मुकाबला गर यूं ही उखड़ जाना था

The Story of life

Reference to death was a ruse

To tell the story of life that ensues

It is journey so beautiful all along

Has a flavour of heaven so strong

Thoughts though define much of it

Yet have power to destroy life bit by bit

Keep your thoughts in constant repair

In tune with natural and humanistic flair

Ideas that keep changing like weather

Never last long and soon wither

But the ones based on right principles

Are like a climate of a place unchangeable

Swept off feet in a gush of air

Can it weather storms flushed with dare

Sunday, August 3, 2025

Manisha, The Artist

Manisha, the Artist

Unique as you are, creating things unique

That have never been created, never shall be

God and artist are creators much the same

One creates nature and the other emotions may be

The difference between scientists and artists is:

That a scientist discovers what has always existed

Some one some day, would surely find that truth

If only one observed, experimented and persisted

Science is a systematic enquiry into the truth

Whereas art is a lived experience of all our senses

An artist creates from deep emotional experiences

Both seek the same truth through different lenses

God creates all that this beautiful universe adorns

Scientists uncover the mysteries of those creations

Artist’s creations decorate our ephemeral sojourns

Manisha the artist, delves deep for inspirations

Sunday, July 27, 2025

ईश्वर से डर क्यूं?

ईश्वर से डर क्यूं

जो है शक्ति का द्योतक, उससे डर क्यूं
जो है सर्वज्ञ, स्थितप्रज्ञ, उससे भय क्यूं
व्याप्त सबके अन्दर, खोज अन्यत्र क्यूं
भाव का है भूखा, फिर यह आडम्बर क्यूं

कब वो किसी से कुछ कहता और मांगता है
कहां किसी से त्याग और बलिदान चाहता है
हरेक की मांग पर, तथास्तू सदैव कहता है
अन्त:आवाज बन, कर्म की गठरी खोलता है

प्रत्यक्ष तो आता नहीं, हरेक में सदैव बसता है
माध्यम बन, विभिन्न गुणों से सबको रचता है
कर प्रयोग उनका, देवत्व को प्राप्त हो सकता है
क्यों भटकना इधर उधर जब वो हममें व्याप्त है

ईश्वर का डर दिखा, करते हैं अपना उल्लू सीधा
स्वर्ग और नरक का भय बिठा, पैदा करते हैं दुविधा
अनपढ़ भी पोथी पढ़, श्लोक बांच, करते गुमराह हैं
भविष्य का डर बता, स्वार्थ सिद्धि का चुनते राह हैं

धर्म का, धर्म के ठेकेदारों ने किया बहुत दुरुपयोग है
अपनी शक्ति, धन, स्वार्थ हेतु किया नित्य उपयोग है
लोगों के मन में अदृश्य डर, अंधविश्वास से उभारा है
कर्म काण्ड के मायाजाल में नित्य ही उलझाया है

है वो सर्व शक्तिमान, सर्व व्याप्त, सर्वज्ञ, दानवीर
प्रकृति के नियमों को रच, करता प्रेरित, बनो कर्मवीर
है वो निराकार, स्वयं तो आता नहीं, बस कृपा आती है
शरीर, बुद्धि, भावना विवेक को माध्यम बनाती है

विडम्बना कि, शक्ति दाता ही भय का कारण है बना
हमारी सोच, विचार क्रियाशीलता को परस्पर है हना
समाज में विषमता, वैमनस्य, फूट उसके नाम फैलाया
गरीब, अशिक्षित, बेरोजगारो को बहकाया, भरमाया

धर्म के खेल का माया जाल काटना है नहीं आसान
शिक्षा, विज्ञान, इन्सानियत, प्रगति ही है समाधान
पर जब शिक्षित भी अंधविश्वास नहीं हैं छोड़ पाते
देश व समाज के समक्ष, बड़ा प्रश्न चिन्ह हैं छोड़ जाते

ईश्वर द्योतक है प्रेम का, साहस का, भक्ति का, बल का
कहां स्थान इन सब में है भय का, चिन्ता का, डर का
पवित्र यह अनुभूति, जो, आत्मा को कर प्रकाशित
मार्ग को प्रशस्त करती, चेतना को करती प्रज्वलित

राजीव सिंह
नोएडा
१५ अक्टूबर २०१९

अदरक कूटने की आवाज

अदरक कूटने की आवाज

राजीव 'रंजन' 

उनींदा सी मेरे कानों को अदरक कूटने की आवाज मंदिर के घंटी सी लगती है

हवाओं को चीरती एक मीठी सी प्यास, सुबह की चाय को तलब करती है

मैं चुपचाप लेटी आधी सोई आधी जागी, दबे कदमों का करती इंतजार हूं

बगल में कप रखने की हल्की आवाज के लिए दिल थाम रहती बेकरार हूं

एक हल्की सी आवाज़ "मनीषा चाय", कानों को लगती कितनी प्यारी 

मैं करवट बदल, पहली घूंट की, मन ही मन, करती हूं आलस भरी तैयारी 

सुबह के गर्म चाय से मुझे मिलता है वो सुकून जो मेरी समझ से बाहर है

अद्भुत वो पहली घूंट पूरे दिन के लिए जो भरती भरपूर शक्ति मेरे अंदर है

कुहनी पर उचक, अधखुली आंख से, सिकुड़े होंठों से, लगाती सुडुक प्यारी 

अमृत रस जैसे उतरता गले से, तरोताजगी भरता अंदर तक धीरे-धीरे हमारी

औंधी लेट, घूंट दर घूंट, चाय के साथ विचारों में गुम, मैं सोती उठती रहती हूं

दिन भर के उहापोह के बवंडर में 

बेझिझक मैं इस परम आनंद के लिए कुछ भी कर सकती हूं न्योछावर 

तहे दिल से शुक्रिया उस व्यक्ति का जो देता है यह परम सुख, है वो मेरा वर

 (पत्नी के आग्रह पर लिखी है यह कविता। उनकी भावनाएं, मेरे शब्द)

नोएडा

20 मार्च 2025

Sunday, June 15, 2025

एक नारी की अनूठी कहानी

एक नारी की अनूठी कहानी 

राजीव 'रंजन' 

एक कहानी अनूठी सी आज सुनाता हूं

नारी के जीवन की विडंबना बताता हूं

धूम धाम से बारात आई गांव में उसकी

१४ वर्ष की थी, शादी हो रही थी जिसकी

गाजा बाजा, नाच नचनियों का था बंदोबस्त 

खाना पीना इतना अच्छा कि सब थे मस्त

समय आया बिदाई का, मिलनी पर थे सब बैठे

लड़के वाले तो पहले से ही रहते हैं कुछ ऐंठे

बे सिर पैर के मजाक पर, अहंकार टकराया

न जाने कब इज्जत का मामला गहराया

बिदाई के धोती की टोकरी को मार लात

उठ चली बारात, बिना खाए मिलनी की भात 

दुल्हन की डोली पहले ही विदा हो चुकी थी

गांव से बाहर सनिचरा बाबा के पास रुकी थी

रोती कलपती, गई वो बच्ची अपनो को छोड़

२५ वर्षों तक, न लौट पाई मैके, भाग्य को मोड़

मां बाप, नातेदार, रिस्तेदार सब स्वर्ग सिधारे

बेटी मिल न पाई कभी उनसे, लौट अपने द्वारे

खोखले अहंकारों की बली चढ़ गयी थी नारी

उसके आंसूओं की कीमत समाज ने नकारी

भूल अपने अस्तित्व को बनी मां, चाची, दादी

नए घर और समाज को अपना, वो सीधी सादी

दिन बीता, वर्ष बीते, बीता एक युग, पलटा भाग्य

दो भाईयों की थी अकेली बहन, जागा अनुराग 

भाई थे पढ़ें लिखे, छोड़ दकियानूसी ख्याल

आए बहन के द्वार स्नेह की अपनी बाहें पसार

बहन घंटो रोती रही, छोटे भाइयों से गले मिल

ईश्वर ने जैसे लौटाई थी यादें, खुशियां और दिल

कहां बैठाऊं, क्या खिलाऊं चल रहा था उहापोह

गांव घर के लोग न अघाते थे देख बहन भाई का मोह

साग्रह किया बहन को विदा कर ले जाने की इच्छा

सहर्ष हुई सब तैयारी, और खत्म हुई वर्षों की प्रतीक्षा

अद्वितीय हुआ मैकै में बहन का स्वागत सत्कार 

छ: माह बाद पतिदेव आए विदा कराने ससुरार

भाई ने प्रेम से पूछा कि 'दीदी क्या दें तुम्हें विदाई'

मां ने सरस हृदय से मांगा अपने पुत्र की पढ़ाई 

"भाई आप तो सक्षम बैरिस्टर हैं, मेरे पुत्र को पढ़ा दें"

"अपने पुत्र के साथ इस पर भी ज्ञान की वर्षा करा दें"

भाई ने वचन दिया और मेरे पिता इस तरह पढ़ पाए

अपने मामा के संरक्षण में उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाऐ

उसके कारण हम तीन भाईयों को भी हुई प्राप्त शिक्षा  

और हमारे बच्चों ने भी पढ़ लिख कर पाई दीक्षा

परिवार ने जाना पढ़ाई लिखाई का जीवन में महत्व

पर इस सब के पीछे था एक नारी का व्यक्तित्व 

जीवन भर के उसके त्याग और स्नेह की कहानी

और आंसूओं से लिखे सपने और उसकी परेशानी

Sunday, June 1, 2025

A tribute to Papa on 1st June 2025

Tribute to Papa on June 1

My father-in-law Shri Vidya Prakash Singh was a remarkable person - with quiet strength and wisdom of a saint. He passed away in AIIMS on the 1st June 2003 after a brief struggle with pancreatic cancer. A tribute to him on his 22nd Punyatithi

22 years rolled by yet your memories are fresh

You stood in our lives like a strong buttress 

With a quiet strength and wisdom of a saint 

You waded through life without complaint

Unconditional acceptance was key to your life 

Be it people, situations, positions or strife

You gave your best to what came your way

Your approach always exercised positive sway

With malice to none and affection for all

To this Papa, you make, even tallest small

Your laughters and chuckles brought smiles

Memories are fresh as we walk our miles 

You left us so soon, leaving a big hole in our hearts

We miss you Papa, your memory never ever departs

In our memories and life, you stand tall like a colossus

Like a true guardian angel forever watching over us 

Today we pay a heartfelt tributes to our ideal

Drawing strength and lessons from the real

Rare are those who leave legacies profound

You were one whose strong memories abound